पवित्र तीर्थधाम-प्रेरणापीठ
♦ पवित्र तीर्थधाम-प्रेरणापीठ ♦

    सतपंथ धर्मका प्रेरणास्त्रोत, पवित्र तीर्थधाम जिसके स्मरण मात्रसे मनुष्य के तन-मन के दोषोका निवारण हो जाये , जहा स्वेत धव्जा और पवित्र अंखड दिव्य ज्योती के दर्शन मात्र से मानव मनको शांति मिले ऐसी सदगुरु श्री इमामशाह महाराज के द्वारा छेसो वर्ष पूर्वे स्थापीत पुण्यशाळी पवित्र भूमी ही प्रेरणापीठ-पीराणा हे .

    जिसने जीवनमें ऐकबार भी इस पवित्र भूमिके दर्शन न किये हो उसका जीवन अधुरा ही हे.

इस तीर्थधाम की खास विशेषताए
(1) कुंवारीका स्थल.
(2) समाधीस्थल.
(3) सुध घी की अंखड दिव्य ज्योत.
(4) स्वेत ध्वज.
(5) चांदीकी चरण पीदुका.
(6) सोना का कलश.
(7) नगीना गोमती.
(8) ठंडी शिला
(9) लोहे की बेडी (संकल).
(10) ढोलीया मंदिर.

    छेसो वर्ष पूर्वे सदगुरु श्री इमामशाह महाराज हिन्दुस्तानमें हिन्दु वैदिक धर्मका प्रचार करते करते अंत मे अहमदाबाद के गीरमठा गाव में आकार, द्वापरयुग में श्री कृष्ण भगवान द्वारा कुंवारीका धरतीके रक्षण के लिए सिंह को प्रगट किया था. वह सिंह गीरमठा गाव के पश्चिम अघाट जंगलमें रहता था, उस दिशामें तीर चलाकर सिंहके कानको छेदकर तीर धरतीमें समां गया . उस स्थल पर सदगुरु श्री इमामशाह महाराजे प्रेरणापीठनी पिराना कि स्थापना की. और उस स्थल को ''कुंवारीका क्षेत्र'' कहते हे. और उस स्थल में सदगुरु श्री इमामशाह महाराजे अंतिम समय में पांचशिष्योकी हाजरीमें फुलो का ढेर बन के स्वधामे गये , उस पवित्र स्थल को ''समाधीस्थल (मंदिर)'' कहते हे .

    सदगुरु श्री इमामशाह महाराज अंतिम समय में अपने पांच पट्टशिष्योको बुलाकर सत्यधर्मकी वात समजायी और स्वयं को परम तत्वमें विलय होने की बात की. उसके बाद सदगुरुजी ने खली दिये में बाति रखकर अपनी दिव्य शक्तिके योगबल से स्वयं ज्योती को प्रगट की. उनके पांचो शिष्यो नाया महाराज, शाणाकाका, कीकीबाई , भाभाराम और चंदनवीर महाराजको कहा की मेरे स्वधाम में जाने के बाद भी यह ''दिव्यज्योति'' अंनत काल तक रहेगी और यह ''स्वेत ध्वज '' धर्म और शांतिका संदेश देते हुए कायम लहराती रहेगी और यह ''चांदीकी चरण पादुका'' का पूजन करना.

    सदगुरु श्री इमामशाह महाराज ने पहलेसे ही समाधी स्थळ तैयार कराएथे. उसके उपर घुम्मट बनाएथे उसके उपर ''सोने का कळश'' लगाये थे जो आज भी दश्यमान हे. सदगुरु श्री जहा बेठ कर धर्म उपदेश देते वह स्थल '''नगीनागोमती'' कहलाता हे जोकि समाधी स्थलके सामने हे.

    समाधी स्थल और नगीना गोमटी के बिच में चंदनवीर (मुख्यपट्टशिष्य) की समाधी हे. चंदनवीरकी समाधी के बाजु में जहा सदगुरु कायम तपश्चर्या करते उस जगह पर जो शिला हे उसे ''ठंडीलाधी (ठंडी शिला)'' कहते हे. आज भी कितनी भी गर्मी हो पर वो शिला गर्मी में भी ठंडी रहती हे.

    यात्रालुओ अपने कार्यनी सफलता मिलेगी या उनके दुःख तकलीफ का निराकरण के लिए पैर में “लोहे की बेडी(संकल)'' पहन कर सफळता का बोल लेते हे. जो उनका कार्य सिद्ध होने का हो तो संकल अथवा बेडी अपने आप खुल जाती हे.

ढोलीया मंदिरका वर्णनः

    सदगुरु श्री इमामशाह महाराज ज्यां रहेता, आराम करता तेना प्रतिक समो ढोलीयो ज्यां छे तेने ढोलिया मंदिर कहेवामां आवे छे. तेमना ढोलीया पासे ''सोनानुं कडुं इंट'' छे जे देवोए सदगुरु श्री इमामशाह महाराज ने सर्व श्रेष्ठताना एवोर्ड तरीके आपेल हती. ढोलीया पासे ''कल्पवृक्ष'' ना झाडनुं चित्र छे. जेनां तेना उपदेशना श्रेष्ठ सुवाक्यो टुंकाणमां छे. बाजुमां भविष्यमां थनार निष्कलंकी भगवाननुं वाहन ''श्वेत घोडो'' अने तेनुं आयुध तलवार छे. (हाल ते तलवार तेना सिंहासन उपर छे.) ढोलीया मंदिरना मध्य भागमां भगवान श्री निष्कलंकी नारायणनुं सिंहासन, ब्रह्मा, विष्णुं, महेशनां प्रत्येक चित्रो साथे आरसपहाणनी मांडवडी छे. तेमां साइडे आधशक्तिमानी अखंड ज्योति छे. आ जग्याए सवार-सांज नियमीत संध्या-आरती तथा महापुजा यज्ञ थाय छे. महायज्ञ कुंभकळश पुजामां ब्रह्मा-विष्णु-महेश-आधशक्ति आधनारायण-तेत्रीस कोटी साथे सर्व देवोनुं सुक्ष्मरुपे आहवान कराय छे. नव अवतारोने वंदन दशमा अवतार श्री निष्कलंकी नारायणनुं पूजन अर्चन करवामां आवे छे. आ यज्ञमां जरुर पडे गत जीवात्माओनी मंत्रो द्रारा सदगती करवामां आवे छे. आ महा वारियज्ञनो भक्तो लाभ लइ धन्यता अनुभवे छे.

    आ ढोलीया मंदिरमां आ संस्थाना थइ गयेला 21 गादीपतीओ उमरांत 22मां गादिपति ब्रह्मलीन जगदगुरु आचार्य करसनदासजी महाराजनां प्रतिको छे. तेमज सदुगुरु श्री इमामशाह महाराजनुं पण मोटुं चित्र छे. तथा सदगुरुश्री तथा तेना पट्ट शिष्य नायामहाराजना चित्रोरुपे उपदेश दर्शावता चित्रो छे. तदउपरांत विष्णु भगवानना दश अवतारोनां चित्रो अने रामायण, महाभारतनाचित्रो, कृषणरासलीलानां चित्रो, मीरांबाइ, कबीर, नरसींह महेता वि.संतोना चित्रो उपर उलटी साइड धाबामां चित्रेल छे.

    साइडनी दिवालोमां सदुगुरु श्री इमामशाह महाराज रचित ''मुळबंध'' ग्रंथना आत्मज्ञानने लगतां लखाणोनां जे निष्कलंक गीताना सुवाक्यो छे. ते लखाणोना मोटां साइन बोर्डो लगावेला छे. तेमां क्रर्म प्रमाणे फळ उपरांत आ मनुष्य जन्म शा माटे.... अने आ जन्मे ज कार्य सिद्धि प्राप्त करी जीवन मुक्त केम थवुं ते दर्शावे छे.

उपर ⇑